तान्हाजी मूवी रिव्यू

कलाकारअजय देवगन,सैफ अली खान,काजोल,शरद केलकर,नेहा शर्मा,पद्मावती राव,शशांक शेंडेट
निर्देशकओम राउत
मूवी टाइपHistory,Drama
अवधि2 घंटा 15 मिनट
Source navbharat times

आशुतोष गोवारिकर की हिस्टॉरिकल फिल्म पानीपत के बाद निर्देशक ओम राउत तानाजी द अनसंग वारियर के साथ प्रस्तुत हुए हैं। पानीपत के बाद तानाजी एक और ऐसी ऐतिहासिक फिल्म है, जो मराठा साम्राज्य की शूरवीरता को भव्य अंदाज में दर्शाने में कामयाब रही है। ऐतिहासिक फिल्में और वो भी खास तौर पर युद्ध के विषय पर बनी फिल्में कई बार बोझिल, भारी और उबाऊ हो जाती हैं, मगर इसे निर्देशक की खूबी कहना होगी कि इतिहास के महत्वपूर्ण अध्याय से ली गई इस कहानी में जांबाजी, रोमांस, थ्रिल, विश्वासघात जैसे सारे एलिमेंट्स हैं और उस पर सोने पर सुहागा कहलाने वाला 3 डी इफेक्ट्स जो पूरी फिल्म को शुरू से अंत तक देखने लायक बनाता है।

कहानी इतिहास के उस पन्ने की है, जहां औरंगजेब (ल्यूक केनी) पूरे हिंदुस्तान पर मुगलिया परचम को लहराने की रणनीति बना रहा है और दक्खन (दक्षिण) शिवाजी महाराज(शरद केलकर) अपने स्वराज्य को लेकर ली गई कसम के प्रति कटिबद्ध है। इतिहास में यह युद्ध (4 फरवरी 1670) को सिंहगढ़ का युद्ध के नाम से दर्ज है। 17वीं शताब्दी में शिवाजी महाराज का परममित्र और जांबाज योद्धा सूबेदार तानाजी मालसुरे (अजय देवगन) अपनी पत्नी सावित्रीबाई (काजोल) के साथ अपने बेटे की शादी की तयारियों में व्यस्त हैं। वे इस बात से अंजान है कि पुरंदर संधि में कोंडाणा किले समेत 23 किलों को मुगलों के हवाले कर देने के बावजूद मुगलिया सल्तनत की प्यास नहीं मिटी है। जिस वक्त राजमाता जीजाबाई ने कोंडाणा का किला मुगलों के हवाले किया था, उसी वक्त उन्होंने शपथ ली थी कि जब तक इस किले पर दोबारा भगवा नहीं लहराएगा, तब तक वे पादुका नहीं पहनेंगी। औरंगजेब अपने खास, विश्वासपात्र और बर्बर प्यादे उदयभानु राठोड(सैफ अली) को भारी-भरकम सेना और नागिन नामक एक बड़ी तोप के साथ कोंडाणा किले की और कूच करने का आदेश देकर मराठा साम्राज्य का खात्मा करने का मन बना चुका है।

शिवाजी महाराज अपने बहादुर और प्यारे दोस्त को इस वक्त युद्ध की त्रासदी में शामिल नहीं करना चाहते, वो इसलिए कि वह नहीं चाहते कि तानाजी के शादी वाले घर में युद्ध का ग्रहण लगे। मगर जब तानाजी को पता चलता है कि स्वराज्य और शिवाजी महाराज खतरे में है, तो वह बेटे की शादी की परवाह किए बगैर भगवा पहनकर उदयभानु का सर कलम करने को निकल पड़ता है। उदयभानु जांबाजी में तानाजी से कहीं कमतर नहीं है और उसमें बर्बरता भी भरी हुई है। इसी प्रवृत्ति के तहत वह विधवा राजकुमारी कमलादेवी (नेहा शर्मा) को उठा लाता है और अपनी रानी बनाने पर अड़ जाता है। असल में कमला उसका पहला प्यार थी, मगर उसके द्वारा ठुकराए जाने और लज्जित किए जाने के बाद वह मुगलों से जा मिला। उदयभानु राठोड के साथ हुए युद्ध में तानाजी को शौर्यता के साथ-साथ विश्वासघात भी मिलता है। क्या तानाजी उदयभानु का खात्मा कर पाता है? क्या वह शिवाजी महाराज को दिए गए वचन का पालन कर पाता है? इसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

तान्हाजी

मूवी रिव्यू: तान्हाजी: द अनसंग वॉरियर

लोकमान्य एक युग पुरुष जैसी ऐतिहासिक फिल्म में बेस्ट डायरेक्टर का फिल्फेयर अवॉर्ड जीत चुके ओम राउत ने फिल्म की कहानी के साथ वीएफएक्स पर भी खूब मेहनत की है। फिल्म ग्रिपिंग है। 3डी के अंतर्गत युद्ध के दृश्यों को देखना किसी विजुअल ट्रीट से काम नहीं है। जर्मनी के एक्शन डायरेक्टर रमाजान ने मराठा की छापमार युद्ध तकनीक को ध्यान में रखते हुए उस दौर के वॉर सीन्स को डिजाइन किया, जो काफी रोचक और थ्रिलिंग बन पड़े हैं। तलवारबाजी के तरीकेकार भी दर्शनीय बन पड़े हैं। किलों और घाटी को विजुअल इफेक्ट्स से अच्छी तरह सजाया गया है। संगीत की बात करें, तो सचेत परंपरा, अजय-अतुल और मेहुल व्यास जैसे संगीतकारों की मौजूदगी में ‘शंकरा रे शंकरा’, ‘माय भवानी’ और ‘घमंड कर’ जैसे गाने और उनकी कोरियोग्राफी अच्छी बन पड़ी है।

जांबाज योद्धा के रूप में अजय देवगन हर तरह से फिट और फाइनेस्ट रहे हैं। युद्ध के दृश्यों में उनकी चपलता देखते बनती है। स्वराज्य के लिए उनका मर-मिटनेवाला इमोशन भी उनके चरित्र को खास बनाता है। काजोल के साथ उनकी केमेस्ट्री भी दिलचस्प है। उदयभानु राठोड के रूप में सैफ अली लाजवाब रहे हैं। कई जगहों पर वे अजय की तुलना में बीस साबित हुए हैं। तानाजी में खलनायक बेहद मजबूत है। सैफ ने अपने किरदार की बर्बरता को सशक्त तरीके से निभाया है। दूसरों को प्रताड़ित करते हुए आसुरी आंनद की प्राप्ति करनेवाले दृश्यों में उनकी ब्लैक कॉमिडी भी नजर आती है। काजोल ने अपनी भूमिका को ईमनदारी से निभाया है। उन्हें और ज्यादा स्क्रीनस्पेस दिया जाना चाहिए था। शिवाजी के रूप में भले शरद केलकर की कदकाठी मैच न खाती हो, मगर अपने बॉडी लैंग्वेज और भाव-भंगिमा से उन्होंने इस किरदार को संस्मरणीय बनाया है। सहयोगी कास्ट मजबूत और विषय के अनुरूप रही है।

क्यों देखें-ऐतिहासिक फिल्मों और 3 डी के शौकीन यह फिल्म दमदार परफॉर्मेंस के लिए देख सकते हैं।

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